Saturday, 20 August 2022

फिर कोई चुभन खलती नहीं

सुकून को जब दिल में क़ैद किया तो एक दरार उभर आया
वा'दा-ख़िलाफ़ी का ख़याल आया तो एक क़रार उभर आया

उस एक आवाज़ पर सीने में मातम छा गया गला भर आया  
औ" साथ इसके  दिल में यादों का  एक मज़ार  उभर आया
 
मुफ़लिसी हो या हो कोई और दौलत तन्हा कभी नहीं आया  
दामन का दाग से ये एक कैसा रिश्ता बे-क़रार उभर आया
 
क़ुदरत ने रिश्ता 'अता किया औ" दो रूहों ने सींचा उसको 
फिर क्या बात हुई साँसों में क्यूँ नज़रों में ग़ुबार उभर आया
 
वो एक चिंगारी थी मगर रूह को उसकी तपन अच्छी लगी 
कि बाद इसके ख़ुद को जलाने का  एक शरार उभर आया
  
वक़्त का जब ढ़लान देखा तो फिर कोई चुभन खलती नहीं 
औ" ता-उम्र के लिए 'धरम' दिल में एक सहार उभर आया    

Monday, 8 August 2022

कब रिश्ते को दौलत-ए-ईमान दे सका

कि साँसों का ग़ुलाम  तख़ईल को कब उड़ान दे सका
ख़ुद को सफ़र में  कब वो जरुरत का सामान दे सका   

बस एक चिंगारी उठी औ" दिल सुलगकर जलने लगा  
न दिल को संग बनाया न कोई 'इल्म-ए-वीरान दे सका

रूह को दिल में क़ैद करना एक क़त्ल से कम न रहा 
दिल-ए-सल्तनत  रूह को कब कोई फ़रमान दे सका

इश्क़ में या तो क़त्ल हो जाना या फिर क़त्ल कर देना 
अलावा इसके ख़ुद को कोई और न अरमान दे सका 

साँसों में साँसें क्यूँ उलझी क्यूँ सीने में मर्ज़ उभरता रहा 
इसका न कोई तबीब ही हुआ न कोई दरमान दे सका
  
"धरम" रूह में झाँका  दिल में उतरा  साँसों में समाया 
बाद इसके भी कब रिश्ते को दौलत-ए-ईमान दे सका 

Thursday, 4 August 2022

क़त्ल दुबारा कर दिया

सीने में ख़ुद ही से दिल को किनारा कर दिया
नज़रें जब मिलीं एक धुँधला नज़ारा कर दिया
 
एक ही क़त्ल पर  जवानी  कहाँ ख़त्म होती है   
आगोश में फिर लेकर क़त्ल दुबारा कर दिया
 
सर पर ताज रखा फिर अंदाज़-ए-नायाब रखा
जलाकर ताज चार सू नायाब शरारा कर दिया

घूँट में समंदर पिया  अश्क़ से फिर बना दिया
अंदाज़ा अपने कद का  ऐसे इशारा कर दिया

जनाज़ों की सीढ़ी  इंसां के लहू में तैरता तख़्त
हरेक क़त्ल  सर-ए-महफ़िल गवारा कर दिया

लेकर साँस मेरे सीने की  तेरे सीने में डाल दी
जो मेरा था "धरम"  उसको तुम्हारा कर दिया

Monday, 1 August 2022

वो ताज पिघलाता रहा

जब उड़ाकर ग़ुबार इंसान आईना देखता रहा 
शक्ल तो धुँधली रही मगर चेहरा दिखाता रहा

रिश्ता जब दफ़्न हुआ  एक कसक बचती रही  
क़ब्र की ज़मीं छोटी रही मुर्दा पैर फैलाता रहा   
  
जब मायने  उनके क़त्ल के  मुर्दों से पूछा गया   
हर ओर फैली ख़ामोश रही हल्क़ सुखाता रहा

आग़ाज़-ए-इश्क़ की चिंगारी बुझने के बाद भी 
वो एक तपन होती रही जो दिल सुलगाता रहा 

बुलंदी तब मिली जब आसमाँ और ऊँचा हुआ 
ख़ुर्शीद अपनी उम्र तक वो ताज पिघलाता रहा 

हुस्न को बुलंदी पर "धरम"  तन्हाई खलती रही 
जिस्म से लिपटने को   एक साया लहराता रहा