Thursday, 4 August 2022

क़त्ल दुबारा कर दिया

सीने में ख़ुद ही से दिल को किनारा कर दिया
नज़रें जब मिलीं एक धुँधला नज़ारा कर दिया
 
एक ही क़त्ल पर  जवानी  कहाँ ख़त्म होती है   
आगोश में फिर लेकर क़त्ल दुबारा कर दिया
 
सर पर ताज रखा फिर अंदाज़-ए-नायाब रखा
जलाकर ताज चार सू नायाब शरारा कर दिया

घूँट में समंदर पिया  अश्क़ से फिर बना दिया
अंदाज़ा अपने कद का  ऐसे इशारा कर दिया

जनाज़ों की सीढ़ी  इंसां के लहू में तैरता तख़्त
हरेक क़त्ल  सर-ए-महफ़िल गवारा कर दिया

लेकर साँस मेरे सीने की  तेरे सीने में डाल दी
जो मेरा था "धरम"  उसको तुम्हारा कर दिया

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