सीने में ख़ुद ही से दिल को किनारा कर दिया
नज़रें जब मिलीं एक धुँधला नज़ारा कर दिया
नज़रें जब मिलीं एक धुँधला नज़ारा कर दिया
एक ही क़त्ल पर जवानी कहाँ ख़त्म होती है
आगोश में फिर लेकर क़त्ल दुबारा कर दिया
सर पर ताज रखा फिर अंदाज़-ए-नायाब रखा
जलाकर ताज चार सू नायाब शरारा कर दिया
घूँट में समंदर पिया अश्क़ से फिर बना दिया
अंदाज़ा अपने कद का ऐसे इशारा कर दिया
जनाज़ों की सीढ़ी इंसां के लहू में तैरता तख़्त
हरेक क़त्ल सर-ए-महफ़िल गवारा कर दिया
लेकर साँस मेरे सीने की तेरे सीने में डाल दी
जो मेरा था "धरम" उसको तुम्हारा कर दिया
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