Monday, 8 August 2022

कब रिश्ते को दौलत-ए-ईमान दे सका

कि साँसों का ग़ुलाम  तख़ईल को कब उड़ान दे सका
ख़ुद को सफ़र में  कब वो जरुरत का सामान दे सका   

बस एक चिंगारी उठी औ" दिल सुलगकर जलने लगा  
न दिल को संग बनाया न कोई 'इल्म-ए-वीरान दे सका

रूह को दिल में क़ैद करना एक क़त्ल से कम न रहा 
दिल-ए-सल्तनत  रूह को कब कोई फ़रमान दे सका

इश्क़ में या तो क़त्ल हो जाना या फिर क़त्ल कर देना 
अलावा इसके ख़ुद को कोई और न अरमान दे सका 

साँसों में साँसें क्यूँ उलझी क्यूँ सीने में मर्ज़ उभरता रहा 
इसका न कोई तबीब ही हुआ न कोई दरमान दे सका
  
"धरम" रूह में झाँका  दिल में उतरा  साँसों में समाया 
बाद इसके भी कब रिश्ते को दौलत-ए-ईमान दे सका 

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