जब उड़ाकर ग़ुबार इंसान आईना देखता रहा
शक्ल तो धुँधली रही मगर चेहरा दिखाता रहा
शक्ल तो धुँधली रही मगर चेहरा दिखाता रहा
रिश्ता जब दफ़्न हुआ एक कसक बचती रही
क़ब्र की ज़मीं छोटी रही मुर्दा पैर फैलाता रहा
क़ब्र की ज़मीं छोटी रही मुर्दा पैर फैलाता रहा
जब मायने उनके क़त्ल के मुर्दों से पूछा गया
हर ओर फैली ख़ामोश रही हल्क़ सुखाता रहा
हर ओर फैली ख़ामोश रही हल्क़ सुखाता रहा
आग़ाज़-ए-इश्क़ की चिंगारी बुझने के बाद भी
वो एक तपन होती रही जो दिल सुलगाता रहा
वो एक तपन होती रही जो दिल सुलगाता रहा
बुलंदी तब मिली जब आसमाँ और ऊँचा हुआ
ख़ुर्शीद अपनी उम्र तक वो ताज पिघलाता रहा
ख़ुर्शीद अपनी उम्र तक वो ताज पिघलाता रहा
हुस्न को बुलंदी पर "धरम" तन्हाई खलती रही
जिस्म से लिपटने को एक साया लहराता रहा
जिस्म से लिपटने को एक साया लहराता रहा
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