Monday, 1 August 2022

वो ताज पिघलाता रहा

जब उड़ाकर ग़ुबार इंसान आईना देखता रहा 
शक्ल तो धुँधली रही मगर चेहरा दिखाता रहा

रिश्ता जब दफ़्न हुआ  एक कसक बचती रही  
क़ब्र की ज़मीं छोटी रही मुर्दा पैर फैलाता रहा   
  
जब मायने  उनके क़त्ल के  मुर्दों से पूछा गया   
हर ओर फैली ख़ामोश रही हल्क़ सुखाता रहा

आग़ाज़-ए-इश्क़ की चिंगारी बुझने के बाद भी 
वो एक तपन होती रही जो दिल सुलगाता रहा 

बुलंदी तब मिली जब आसमाँ और ऊँचा हुआ 
ख़ुर्शीद अपनी उम्र तक वो ताज पिघलाता रहा 

हुस्न को बुलंदी पर "धरम"  तन्हाई खलती रही 
जिस्म से लिपटने को   एक साया लहराता रहा 

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