Wednesday, 21 December 2022

तिरा कहीं ठिकाना तो हो

दिलों के फ़ासले को मापने का कोई पैमाना तो हो   
मैं दो कदम चल भी लूँ  कोई अपना ज़माना तो हो 

किसी नज़्म को  ग़र शक्ल  देना भी हो तो कैसे दूँ
आँखों में कोई इल्म ख़याल में कोई फ़साना तो हो  

कलेजे से दिल निकालकर हाथ में लिए फिरता हूँ 
दिल दूँ भी तो किसे दूँ  कोई मुझसा दीवाना तो हो 

उस एक शाम के ख़ातिर कितने शाम को जलाऊँ 
कि ख़्वाब ख़याल नज़र तिरा कहीं ठिकाना तो हो  

रास्ता ख़त्म हो गया मंज़िल का कोई पता न चला  
कैसे कहूँ की होश में था  ऐसा कोई बहाना तो हो 

अपने चेहरे पर "धरम" अपना ही  चेहरा चढ़ाना  
ख़ुद को कभी इस तरह तन्हाई में सजाना तो हो 

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