Wednesday, 25 December 2024

कोई बौना 'उरूज पाएगी

ख़ुशी जब भी आएगी मुहँ  टेढ़ा कर के आएगी 
औ" साथ अपने कुछ गर्द-ओ-ग़ुबार भी लाएगी
 
मुबारकबाद की शक़्ल में रात सियाही छाएगी    
रुत बहारों की आएगी  तो साँसें पिघल जाएगी

एक रूह दूसरे रूह से कुछ ऐसे दूरी बनाएगी      
ग़र नज़र से नज़र मिली  आँख बहुत जलाएगी

रौशनी अँधेरे में खोकर वुजूद अपना मिटाएगी  
रात ख़ुर्शीद को दिन निकलने से पहले खाएगी

हर ज़ुबान सिर्फ़  ख़ुद ही का गीत गुनगुनाएगी
बाक़ी कोई नज़्म शान में गुस्ताख़ी फ़रमाएगी 
   
ज़िंदगी की बुलंदी "धरम" किसी को न भाएगी   
ख़ुद को निगलकर  कोई बौना 'उरूज पाएगी

Friday, 20 December 2024

टूटा शिखर था

वो ख़्वाब की दुनियाँ थी बड़ा तन्हा सफ़र था  
बाद एक घर के बहुत दूरी पर दूसरा घर था

घर की छत ऐसी जैसे कोई उजड़ा शहर था
ईंटें बे-जाँ खड़ी थी अम्न तिरा कैसा असर था
 
कि हरेक घर के सामने एक ही सा मंज़र था  
कुछ बिखरे सूखे पत्ते थे  एक ठूठा शजर था

महज़ एक बूँद पानी में कैसे इतना लहर था
कि जैसे एक चिंगारी में छुपा कोई क़हर था

हर बशर के जिस्म में लहू महज़ बूँद-भर था  
और न जाने क्यूँ  रंग आँखों का सुर्ख़-तर था

भाला पर लटकता कोई जिस्म बग़ैर सर था   
बुलंदी की दास्ताँ थी "धरम" टूटा शिखर था

Friday, 13 December 2024

फ़िज़ा को इस क़दर सजाना

सितारों को क़ैद रखना  चाँद को चादर ओढ़ाना
कहाँ से सीखा तूने फ़िज़ा को इस क़दर सजाना

वो गुलाबी शख़्सियत उसपर ये सतरंगी पैराहन
लगते तो हो ऐसे  जैसे कोई कुदरत का ख़ज़ाना

ये तिरे वतन की मिट्टी है  इसे तू माथे से लगाना  
बयाँ लहू भी न कर सके बनो कोई ऐसा दीवाना

ज़ेहन को नींद आती है  आँखों को सब्र आता है 
बड़ा अज़नबी इश्क़ है अजब है इसका फ़साना

सिर्फ़ दरख़्तों की साँसें थीं और वहाँ कोई न था
ज़मीं दरख़्तों से क्या पूछे ये दश्त क्यूँ है वीराना

चाँद तक फैला दरिया सफ़ीने में सिमटा ख़्वाब
बादबाँ में उलझी नींद "धरम"  सफ़र था पुराना