ख़ुशी जब भी आएगी मुहँ टेढ़ा कर के आएगी
औ" साथ अपने कुछ गर्द-ओ-ग़ुबार भी लाएगी
औ" साथ अपने कुछ गर्द-ओ-ग़ुबार भी लाएगी
मुबारकबाद की शक़्ल में रात सियाही छाएगी
रुत बहारों की आएगी तो साँसें पिघल जाएगी
एक रूह दूसरे रूह से कुछ ऐसे दूरी बनाएगी
ग़र नज़र से नज़र मिली आँख बहुत जलाएगी
रौशनी अँधेरे में खोकर वुजूद अपना मिटाएगी
रात ख़ुर्शीद को दिन निकलने से पहले खाएगी
हर ज़ुबान सिर्फ़ ख़ुद ही का गीत गुनगुनाएगी
बाक़ी कोई नज़्म शान में गुस्ताख़ी फ़रमाएगी
ज़िंदगी की बुलंदी "धरम" किसी को न भाएगी
ख़ुद को निगलकर कोई बौना 'उरूज पाएगी
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