वो ख़्वाब की दुनियाँ थी बड़ा तन्हा सफ़र था
बाद एक घर के बहुत दूरी पर दूसरा घर था
घर की छत ऐसी जैसे कोई उजड़ा शहर था
ईंटें बे-जाँ खड़ी थी अम्न तिरा कैसा असर था
कि हरेक घर के सामने एक ही सा मंज़र था
कुछ बिखरे सूखे पत्ते थे एक ठूठा शजर था
महज़ एक बूँद पानी में कैसे इतना लहर था
कि जैसे एक चिंगारी में छुपा कोई क़हर था
हर बशर के जिस्म में लहू महज़ बूँद-भर था
और न जाने क्यूँ रंग आँखों का सुर्ख़-तर था
भाला पर लटकता कोई जिस्म बग़ैर सर था
बुलंदी की दास्ताँ थी "धरम" टूटा शिखर था
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