Friday, 20 December 2024

टूटा शिखर था

वो ख़्वाब की दुनियाँ थी बड़ा तन्हा सफ़र था  
बाद एक घर के बहुत दूरी पर दूसरा घर था

घर की छत ऐसी जैसे कोई उजड़ा शहर था
ईंटें बे-जाँ खड़ी थी अम्न तिरा कैसा असर था
 
कि हरेक घर के सामने एक ही सा मंज़र था  
कुछ बिखरे सूखे पत्ते थे  एक ठूठा शजर था

महज़ एक बूँद पानी में कैसे इतना लहर था
कि जैसे एक चिंगारी में छुपा कोई क़हर था

हर बशर के जिस्म में लहू महज़ बूँद-भर था  
और न जाने क्यूँ  रंग आँखों का सुर्ख़-तर था

भाला पर लटकता कोई जिस्म बग़ैर सर था   
बुलंदी की दास्ताँ थी "धरम" टूटा शिखर था

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