सितारों को क़ैद रखना चाँद को चादर ओढ़ाना
कहाँ से सीखा तूने फ़िज़ा को इस क़दर सजाना
कहाँ से सीखा तूने फ़िज़ा को इस क़दर सजाना
वो गुलाबी शख़्सियत उसपर ये सतरंगी पैराहन
लगते तो हो ऐसे जैसे कोई कुदरत का ख़ज़ाना
ये तिरे वतन की मिट्टी है इसे तू माथे से लगाना
बयाँ लहू भी न कर सके बनो कोई ऐसा दीवाना
ज़ेहन को नींद आती है आँखों को सब्र आता है
बड़ा अज़नबी इश्क़ है अजब है इसका फ़साना
सिर्फ़ दरख़्तों की साँसें थीं और वहाँ कोई न था
ज़मीं दरख़्तों से क्या पूछे ये दश्त क्यूँ है वीराना
चाँद तक फैला दरिया सफ़ीने में सिमटा ख़्वाब
बादबाँ में उलझी नींद "धरम" सफ़र था पुराना
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