Friday, 13 December 2024

फ़िज़ा को इस क़दर सजाना

सितारों को क़ैद रखना  चाँद को चादर ओढ़ाना
कहाँ से सीखा तूने फ़िज़ा को इस क़दर सजाना

वो गुलाबी शख़्सियत उसपर ये सतरंगी पैराहन
लगते तो हो ऐसे  जैसे कोई कुदरत का ख़ज़ाना

ये तिरे वतन की मिट्टी है  इसे तू माथे से लगाना  
बयाँ लहू भी न कर सके बनो कोई ऐसा दीवाना

ज़ेहन को नींद आती है  आँखों को सब्र आता है 
बड़ा अज़नबी इश्क़ है अजब है इसका फ़साना

सिर्फ़ दरख़्तों की साँसें थीं और वहाँ कोई न था
ज़मीं दरख़्तों से क्या पूछे ये दश्त क्यूँ है वीराना

चाँद तक फैला दरिया सफ़ीने में सिमटा ख़्वाब
बादबाँ में उलझी नींद "धरम"  सफ़र था पुराना

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