बात ऐसी कौन सी थी जिसकी उसे ख़बर न थी
मगर मेरे क़द-ओ-क़ामत की कोई क़दर न थी
किसी तंग-दिल की मुंसिफ़ी थी क्या ही कहना
इतनी लम्बी सज़ा जितनी बची मेरी उमर न थी
जो इश्क़ के परिंदे थे मौसम ढ़लते ही चले गए
वहाँ अब परिंदों के उड़ने की कोई लहर न थी
आँखों से आँखें तो मिली मगर दिल मिला नहीं
कोई भी मुलाक़ात कभी ऐसी ज़ख़्म-गर न थी
फ़ासला बस दोनों को हाथ मिलाने भर का था
मगर वो कदम भर की दूरी भी मुख़्तसर न थी
आँख से ओझल था मगर हर वक़्त नज़र में था
उसके नफ़रत की तो कोई पैक-ए-नज़र न थी
बुलंदी अक्स ने पाई जिसे तारीक़ी निगल गई
उसकी शख़्सियत 'धरम' सफ़र-ए-हज़र न थी
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ज़ख़्म-गर : ज़ख़मी करने वाला/वाली
पैक-ए-नज़र : दृष्टि की सीमा
शख़्सियत : किसी व्यक्ति का अस्तित्व या व्यक्तित्व
सफ़र-ए-हज़र : हर समय