Saturday, 15 February 2025

दिल में न कोई ऊल-जलूल रख

ग़र सर पर ताज़ रख  तो ताज़ पर थोड़ी सी धूल रख 
अपने वतन की धूल-मिट्टी के लिए शख़्त उसूल रख

दरिया को रास्ता बताना है  रुख़ हवा का बदलना है
मुफ़लिसों के हुक़ूक़ का हमेशा  रहनुमा-उसूल रख 

यह मु'आमला मज़लूमों का है चाँद-सितारों का नहीं  
फ़ैसला देने वक़्त सामने अपने चेहरा-ए-मक़्तूल रख

ख़ाक से मोहब्बत करनी है  ये राह कुछ आसाँ नहीं      
आँखों में समंदर रख इरादा ख़िलाफ़-ए-मा'मूल रख

ये क्या बात करते हो बात चाँद-ख़ुर्शीद की करते हो             
ग़र इश्क़ है तो सारे शर्त भी मुम्किन-उल-हुसूल रख
 
इस रिश्ते की नींब 'धरम' एक बात एक ईमान से है     
तूने अब ज़बाँ दी है दिल में न कोई ऊल-जलूल रख      
   
 
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रहनुमा-उसूल : क़ानून 
मक़्तूल : मृतक/क़त्ल होने वाला
ख़िलाफ़-ए-मा'मूल : असाधारण, ग़ैरमामूली
मुम्किन-उल-हुसूल : जिसको प्राप्त करना संभव हो
ऊल-जलूल : बेमानी 

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