ग़र सर पर ताज़ रख तो ताज़ पर थोड़ी सी धूल रख
अपने वतन की धूल-मिट्टी के लिए शख़्त उसूल रख
दरिया को रास्ता बताना है रुख़ हवा का बदलना है
मुफ़लिसों के हुक़ूक़ का हमेशा रहनुमा-उसूल रख
यह मु'आमला मज़लूमों का है चाँद-सितारों का नहीं
फ़ैसला देने वक़्त सामने अपने चेहरा-ए-मक़्तूल रख
ख़ाक से मोहब्बत करनी है ये राह कुछ आसाँ नहीं
आँखों में समंदर रख इरादा ख़िलाफ़-ए-मा'मूल रख
ये क्या बात करते हो बात चाँद-ख़ुर्शीद की करते हो
ग़र इश्क़ है तो सारे शर्त भी मुम्किन-उल-हुसूल रख
इस रिश्ते की नींब 'धरम' एक बात एक ईमान से है
तूने अब ज़बाँ दी है दिल में न कोई ऊल-जलूल रख
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रहनुमा-उसूल : क़ानून
मक़्तूल : मृतक/क़त्ल होने वाला
ख़िलाफ़-ए-मा'मूल : असाधारण, ग़ैरमामूली
मुम्किन-उल-हुसूल : जिसको प्राप्त करना संभव हो
ऊल-जलूल : बेमानी
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