काँटों से घिरा दिल था उसका बंज़र नसीब था
न तो दिल-ए-खुशफ़हमी थी न ख़ुदा क़रीब था
क्या कह के पुकारते कि मुआमला अजीब था
नुमाइश-ए-इश्क़ में गले पर दाग़-ए-सलीब था
ज़बाँ खुली ही नहीं कि मु'आमला-ए-हबीब था
फिर कहीं बिछड़ न जाये कुछ ऐसा नहीब था
रास्ते का कुछ ख़याल ही नहीं ऐसे कबीब था
जहाँ से भी गुज़रा वो राह उसका अर्रक़ीब था
छुपाना भी मुश्किल था कि दिल ही लहीब था
वो हक़ीक़त था ऐसा जो शक़्ल पर कतीब था
कि उन बातों का ही क्या जो माज़ी-क़रीब था
वो गुज़रा ज़माना भी "धरम" कितना ग़रीब था
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नहीब : भय, डर, आतंक
कबीब : औंधे मुंह पड़ा हुआ
अर्रक़ीब : रक्षक/ईश्वर का एक नाम
लहीब : अग्नि-ज्वाला, लपट, शोला
कतीब : लिखा हुआ
माज़ी-क़रीब : बीता हुआ समय या काल
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