Wednesday, 3 September 2025

प्रथम गुरु होती है माता

प्रथम शिक्षा शिशु माता के गर्भ में ही है पाता
प्रथम गुरु होती है माता 
पाकर स्नेह पिता का शिशु गर्भ में है इठलाता 
प्रथम गुरु होती है माता

बात अनोखी भेद चक्रव्यूह का 
अजन्मा अभिमन्यु  कैसे है पाता
प्रथम गुरु होती है माता    

पश्चात् जन्म शिशु धरा के संपर्क में है आता
प्रकृति से अनायास ही बहुत कुछ है पाता 
प्रथम गुरु होती है माता

छात्र जीवन में विद्यालय की भूमिका है अद्भुत 
यहाँ आचार्यों के मार्गदर्शन में शिशु 
शिक्षा के सागर में गोता है लगाता 
ज्ञान के मोती चुनता 
अपने ललाट पर पिरोता 
प्रथम गुरु होती है माता

महाविद्यालय के प्रांगण में बन वयस्क जब आता 
ज्ञान की महिमा का अनुभव कर गर्वित होता 
गुरु के चरणों में शीश नवाता ज्ञान अलौकिक पाता 
प्रथम गुरु होती है माता

विश्वविद्यालय के प्रांगण में दर्शन जब उसे भाता 
पठन-पाठन के साथ रहस्य शोध के भी पाता
प्रथम गुरु होती है माता

गुरु के मुख से निकली विद्या संग सदा ही रहती 
चाहे कोई चुने तपोवन या चुने गृहस्थी
धर्म अधर्म के संकट से भी मिल जाती है मुक्ति  

मगर शिक्षा का ऋण यूँ ही नहीं उबरता
माथे पर यह ऋण अगर बच जाये तो  
बार बार धरा पर आना है पड़ता

लेकर ब्रह्मराक्षस का रूप 
भटकना पड़ता शिष्य की तलाश में
और यह ऋण ज्ञान देकर ही उबरता 
प्रथम गुरु होती है माता 

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