मरज़ का पता नहीं मगर दवा दी जा रही थी
कि सर-ए-आम ये बात भी बताई जा रही थी
बात कुछ और थी कलाम किसी और का था
औ" सूरत किसी और की दिखाई जा रही थी
यहाँ क़त्ल के गुनाह को रहमत बताया गया
हर रोज़ ये कैसी साज़िश कराई जा रही थी
महफ़िल में ख़ामोशी वैसी की वैसी ही रही
कैसे कहें उसके आने से तन्हाई जा रही थी
वो मु'आमला सिर्फ़ दिल का नहीं रहा होगा
क्या जाने वहाँ वो जश्न क्यूँ मनाई जा रही थी
आदमी सिर्फ़ एक ही था लिबास ढेर सारे थे
औ" फिर सूरत पर सूरत पहनाई जा रही थी
जाने क्यूँ "धरम" बात तू-तू मैं-मैं पर आ गई
फ़िज़ा में धुलकर सारी आशनाई जा रही थी
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