Tuesday, 17 March 2026

गवाही क़ुबूल नहीं होती

कि तिरे दर पे बात कोई भी फ़ुज़ूल नहीं होती  
वहाँ चाँद सितारों की गवाही क़ुबूल नहीं होती

किसी की बर्बादी पर यूँ चुप रहना मुँह मोड़ना
आँखों में पड़ी धूल महज़ कोई भूल नहीं होती

चराग़ों को न जाने क्यूँ तारीक़ी रास आने लगी
ये यारी कभी भी क़ाबिल-ए-क़ुबूल नहीं होती

यहाँ सबकी तबी'अत को  ये कैसी नज़र लगी  
अब तो यहाँ साँसें भी हवा में हुलूल नहीं होती

कभी ज़मीं निगल गई  कभी आसमाँ खा गया 
ख़ुद की तलाश में अब साँसें निर्मूल नहीं होती

एक झोंका था जो तूफ़ान में बदल गया 'धरम'
उसकी तलाश में अब आँखें मलूल नहीं होती

----------------------------------------------------

हुलूल: एक चीज़ का दूसरी चीज़ में पूरी तरह घुल जाना
मलूल: उदास, खिन्न, दुखी, दुःखित, रंजीदा

No comments:

Post a Comment

Note: only a member of this blog may post a comment.