Wednesday, 2 October 2024

नहीं है ए'तिबार यहाँ

कि हर तरफ फैला है धुएँ का ग़ुबार यहाँ  
सब कुछ हो चुका आग का शिकार यहाँ

पता नहीं कौन है किसका क़िरदार यहाँ 
ख़ुद के शक्ल पर कौन पाता वक़ार यहाँ 

दरमियाँ दो घरों के  खड़ी है दीवार यहाँ
जिसके दोनों तरफ रखे हैं हथियार यहाँ

ख़ूनी कौन है  किसका है इक़्तिदार यहाँ  
हर कोई जानता कौन है गुनाहगार यहाँ

मंज़िल का रास्ते से  कैसा है क़रार यहाँ 
बुलंदी के रास्ते में मिलता है उतार यहाँ

ये काँटे कैसे हैं कैसी फैली है बहार यहाँ
चमन को फूल पर नहीं है ए'तिबार यहाँ

पीठ में ख़ंज़र घोपते हैं ग़म-गुसार यहाँ
आस्तीन के साँप होते हैं राज़-दार यहाँ

ये "धरम" कैसी फ़ज़ा है इस बार यहाँ
आँखों में दर्द अब भी है बरक़रार यहाँ

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वक़ार : मान-मर्यादा
इक़्तिदार : आतंक
ग़म-गुसार : दुख-दर्द का बाँटने वाला / हमदर्द

Sunday, 29 September 2024

पतंग बदल लेगा

किसे ख़बर थी की वो ख़ुद ही रंग बदल लेगा  
कुछ देर तो साथ रहेगा  फिर ढंग बदल लेगा

जिसे बुलंदी की चाहत है उसका इश्क़ कैसा  
एक पतंग कटेगा तो दूसरा पतंग बदल लेगा

जो टूट गये वो सारे त'अल्लुक़ात तिजारती थे
अब महफ़िल में आने का आहंग बदल लेगा

उसके कोई उसूल थे ही नहीं बस छलावा था   
हरेक बात पर वो  मुद्द'आ-ए-जंग बदल लेगा

रिश्ते को भी उसने उसूलों की तरह ही रखा    
ग़र दिल पर चोट लगेगी  तो शंग बदल लेगा

जब एक पत्थर में दुआ का कोई असर न हो
"धरम" वो फिर कोई  दूसरा संग बदल लेगा
   
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आहंग : तौर तरीक़ा
शंग : दिल लगी करने वाला
संग : पत्थर

Sunday, 15 September 2024

ख़ंज़र कई सारे दाख़िल थे

अलावा दो जिस्मों के कई और रूह भी शामिल थे
उस क़त्ल में शरीक़ न जाने कितने सारे क़ातिल थे

उस ज़ख़्म के अलावा और कोई ज़ख़्म था ही नहीं    
एक ही सुराख़ था मगर ख़ंज़र कई सारे दाख़िल थे

क़ातिल ने अपना पता बदला भी महफूज़ भी रखा 
शिकार उसके सारे के सारे इस बात से ग़ाफ़िल थे
    
आँखों में मायूसी संभल न सकी ख़ुशी छलक आई
रिश्ता कैसा टूटा जिसमें दोनों के दोनों ला-ज़िल थे

महज़ एक मसअला पर हर किसी की आबरू गई   
कहने को तो महफ़िल में सारे के सारे इफ़ाज़िल थे

वो इलाक़ा कैसा था "धरम" वहाँ रिवायतें कैसी थी       
सारे के सारे नक़ाब-पोश वहाँ शान-ए-महफ़िल थे  
 
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ग़ाफ़िल : बेख़बर
ला-ज़िल : वह सोना जिसमें ज़रा भी खोट न हो
इफ़ाज़िल : प्रतिष्ठित जन / बड़े लोग

Sunday, 8 September 2024

ख़ाक ख़ूब उड़ाया था

यकीं तो नहीं था  मगर फिर भी हाथ बढ़ाया था
इश्क़ था तो नहीं मगर फिर भी ख़ूब जताया था

उस रिश्ते को छुपाया फिर झँकझोर कर देखा    
तिरे लुटने से पहले हाँ ख़ुद को ख़ूब लुटाया था

उस रहबर ने मंज़िल की राह दिखाने से पहले       
याद नहीं घूँट लहू का कितनी बार पिलाया था

ज़िंदा रिश्ता जब दफ़्न किया तो उसके पहले  
न तो ख़ुद से बात किया  न ही मुझे बताया था

कुछ यादें जो क़ैद थी कुछ साँसें जो दफ़्न थी          
उस अँधेरी कोठरी में किसने उसे बसाया था

कि शाख़ें आसमाँ में हैं जड़ दिल में पैवस्त है   
बिना मिट्टी हवा पानी के बाग़ एक लगाया था

सबने सारी ख्वाहिशों को जलाया राख किया    
फिर तिरे नाम का वहाँ ख़ाक ख़ूब उड़ाया था

जब साँस टूटी दिल ने भी धड़कना बंद किया
साँस का दिल पर 'धरम' यह कैसा बक़ाया था

Thursday, 29 August 2024

मर कर किधर जाते हैं

पता नहीं जज़्बात सारे  मर कर किधर जाते हैं  
किताबों में कभी-कभी कुछ हर्फ़ उभर जाते हैं

दरमियाँ गुफ़्तगू के आँखें दोनों की बंद ही रही    
फिर नज़र मिलाते हैं  औ" दोनों बिखर जाते हैं

तन्हाई भी आकर चली गई अश्क़ भी सूख गए 
ये किसके इन्तिज़ार में तिरे आठों-पहर जाते हैं

सारे ज़ख़्मों के निशाँ जो चेहरे पर थे मिट चुके  
तू ऐसी दवा बता जिससे दाग़-ए-जिगर जाते हैं

नज़र औ" दिल दोनों के जहाँ अलग-अलग हैं    
मस'अले दिल के सारे मावरा-ए-नज़र जाते हैं

इंसां की मंज़िल दोज़ख़ या जन्नत ही है 'धरम'   
कौन लोग हैं जो मरकर महबूब-नगर जाते हैं
 
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दाग़-ए-जिगर : प्रेम की आग का दाग़
मावरा-ए-नज़र : दृष्टि से परे

Wednesday, 21 August 2024

बे-इरादा करना है

पहले हरेक लौ को चराग़ से जुदा करना है  
फिर अपने आप को सबका ख़ुदा करना है

अज़नबी शहर है  सारी गलियाँ अज़नबी हैं  
पता ही नहीं दिल को कहाँ फ़िदा करना है

नज़र भी मिलाना है साँसों में बसाना भी है 
फिर मोहब्बत में ता-उम्र ए'तिदा करना है

पूरा जिस्म छलनी है  दिल ज़ख़्म-ज़ख़्म है        
इस रिश्ते में अब और क्या वादा करना है

इरादतन जो भी किया सिर्फ़ ठोकर खाया  
आगे जो भी करना है  बे-इरादा करना है

रूह को जिस्म में क्यूँ क़ैद रखना "धरम" 
अब रूह को जिस्म का लिबादा करना है 

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ए'तिदा: ज़ुल्म
लिबादा: परिधान

Monday, 12 August 2024

रास्ते सारे एक-तरफ़ा थे

कि रास्ते जितने भी थे वो सारे एक-तरफ़ा थे
औ" उस सफ़र के सारे रहनुमा पुर-जफ़ा थे
   
हर सॉंस पर मंज़िल का पता बदल जाता था 
सारे के सारे  मुसाफ़िर औ" रहबर  ख़फ़ा थे
 
कि अक्स पर आँखों को कभी यक़ीं न हुआ   
आईने जितने भी थे  सारे के सारे बे-वफ़ा थे

वक़्त बुझता ही नहीं दर्द कम होता ही नहीं
कि इस बात पर  दोस्त सारे रू-ब-क़फ़ा थे

हाथ मिलाया तो  नज़रों ने  कई इशारे किये 
कैसे कह दें की इशारे सारे 'अर्ज़-ए-वफ़ा थे

यहाँ करम सारे क़हर ही बरपाते थे "धरम"  
कि सितम सारे-के-सारे उम्मीद-ए-शिफ़ा थे  


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पुर-जफ़ा: अत्याचारी, निर्दयी
रू-ब-क़फ़ा: पीछे मुँह किये हुए
'अर्ज़-ए-वफ़ा: निष्ठा की अभिव्यक्ति 
उम्मीद-ए-शिफ़ा: इलाज की उम्मीद

Monday, 29 July 2024

जो भी आया है उम्र-भर आया है

कि क़ब्र से निकलकर  वो फिर से घर आया है  
उसकी यादों का सैलाब फिर से नज़र आया है

इन्सां रास्ते नसीब  तिरे हर ठोकर का शुक्रिया
जो सौ बार गिरकर भी उठने का हुनर आया है

वक़्त का तक़ाज़ा है की वो तिरे दहलीज़ आया   
कब किसके दर पर यूँ माँगने मो'तबर आया है

बे-दर्दी है  दिल पर छा जाता है हुक़्म करता है   
तिरा नाम जब भी आया है  इस कदर आया है

हर बज़्म में मोहब्बत की एक ही सी दास्ताँ है   
सब के सीने में दिल  पिरोने शीशागर आया है

तिरे दिल में  किसी ज़ख़्म के निशाँ  हैं ही नहीं 
कि पास तिरे जो भी आया है उम्र-भर आया है

कैसे कह दूँ कि ज़िंदगी पर तेरा एहसान नहीं     
अब सितम जो भी आया है मुख़्तसर आया है
   
दिल को इस  बात पर तो  बिल्कुल यकीं नहीं  
कि टूट-कर "धरम" इसबार वो इधर आया है

Tuesday, 2 July 2024

जिस्म अपना पिरोने लगा था

कोई दवा न दी गई थी मगर मरज़ ठीक होने लगा था
चाँद आसमाँ से उतरकर  सीने में कहीं खोने लगा था

बरसों की बेचैनी थी यकायक दूर तो न हो सकी मगर 
उसके हाथों में जादू था वो आँखों में नींद बोने लगा था 

वो आख़िरी मुलाक़ात थी  बस साथ बैठे आँखें मिलाई
फिर न जाने क्यूँ  दोनों बिना बात के ही  रोने लगा था

उन लम्हों को बुनते सिलते काफ़ी वक़्त गुज़र गया था 
आँखों में नींद तो न थी मगर न जाने क्यूँ सोने लगा था

वो सफ़ीना-समंदर का इश्क़ था वहाँ होना ही क्या था
समंदर सफ़ीने को आँखों में बिठाकर डुबोने लगा था

आधी उम्र बीतने के बाद "धरम" वो मुलाक़ात हुई थी  
दोनों बाँहों की कैंची में  जिस्म अपना पिरोने लगा था

Sunday, 16 June 2024

अब हवा के साथ जलना है

दिये की लौ को अब हवा के साथ जलना है 
तौर-ए-ज़िंदगी को वक़्त के साथ बदलना है
 
समंदर को अब क़तरा के मानिंद चलना है
सैलाब को पानी बस बूँदों में ही उझलना है

बदन की आग में सिर्फ़ आँख का जलना है
क़लम की आग को  काग़ज़ में कुचलना है

दाग दामन का  कुछ इस तरह से धुलना है 
एक सादे काग़ज़ पर स्याही का मचलना है

वक़्त के इशारों को बस उम्र भर छलना है  
एक चेहरे पर  दूसरे चेहरे का निकलना है

आँखों में बस  एक ही सवाल का पलना है
दिल को इश्क़ से "धरम" कैसे संभलना है