Saturday, 27 September 2014

चंद शेर

1.
ये अकीदत के फूल हैं हर बाग़ में यूँ ही नहीं खिलते हैं
मोहब्बत करने वाले अब तो मुश्किल से ही मिलते हैं


2.
कितना अनजान है मेरे घर का दर-ओ-दीवार भी मुझसे
हर रोज मिलता तो हूँ मगर देखता मुझे हैरत से है

3.
मंज़िल है अभी बहुत दूर सिर्फ गर्द-ए-सफर ही पास है
थामने को यहाँ बस अपने एक हाथ में दूसरा हाथ है

Monday, 22 September 2014

एहसान मैंने कर दिया

खुद अपने क़त्ल का इकबालिया बयान मैंने दे दिया
बाद मेरे मरने के तुम आज़ाद हो ये फरमान मैंने दे दिया

जो भी कुछ हुआ वो सारा ज़ुर्म अपने नाम मैंने ले लिया
कि अपने हबीब-ओ-रक़ीब पर ये एहसान मैंने कर दिया   

Sunday, 21 September 2014

मोहब्बत और हुकूमत

रूदाद-ए-मोहब्बत मैं भूला नहीं हूँ अब भी याद है
वो आधा कब्र औ' आधा दलदल अब भी आबाद है

मोहब्बत की लिखी आयतें अब तो खाक-ए-सियाह है
जो भी बची है मेरी किस्मत उसमे तीरगी बे-पनाह है

मंज़िल का पता भी नहीं निकल गया हूँ राहपैमाई पर
अब तो डर लगता है यहाँ हर किसी की दिलरुबाई पर

दोज़ख़ के बराबर चल रही है यहाँ आदमखोरों की हुकूमत
अब कहीं नहीं मिलता "धरम" किसी इन्शान की सल्तनत

Saturday, 13 September 2014

हम तो धूल हैं

हम तो धूल हैं बस यूँ ही खाक में मिलते रहेंगे
और उठे हमारी आवाज़ तो होठ सिलते रहेंगे

मेरे लहू के रंग से तेरे आरिज़ सुर्ख़ होते रहेंगे
मेरी झोपडी के आग से तेरे महल रौशन होते रहेंगे

तुम मुझे ज़ख्म देते रहो हम तुम्हें मजा देते रहेंगे
तुम बरपाओ कहर हमपर हम तुम्हें आबाद करते रहेंगे

अमीरी-मुफ़लिसी तो यूँ ही बेस-ओ-कम होते रहेंगे
हम लुटकर भी फ़क़ीरी में ज़िंदगी का मजा लेते रहेंगे 

Wednesday, 10 September 2014

मेरी ज़िंदगी!

कितना डूब चूका हूँ कितना डूबना बाकी है
ऐ ज़िंदगी! तेरी गहराई का मुझे अंदाजा नहीं

हरेक डूब में लब से बस एक आह! निकलती है
पुराना ज़ख्म भरता भी नहीं नया निकल आता है

खुद अपने बदन के ज़ख्म को मैं पहचानता भी नहीं
कि किसने दिए हैं कौन ज़ख्म ये अब मैं जानता नहीं

अपनी धड़कन से भी अब ज़िंदगी का एहसास होता नहीं
यहाँ कितनी भीड़ है ज़माने में मगर कोई पास होता नहीं

इन्तहां हो गई फिर भी ज़ख्म का सिलसिला जारी है
मगर ऐ मेरी ज़िंदगी! मेरा तुझपे अब भी एतवारी है 

Wednesday, 3 September 2014

चंद शेर

1.
हवा का रुख किधर का भी हो बुझता मेरा ही चिराग है
हर बार हुकूमत की लड़ाई में डूबता मेरा ही आफताब है 

Sunday, 31 August 2014

नेकी कर

पुरानी कहावत है
"नेकी कर दरिया में डाल"

अब यह कहावत कुछ इस तरह है
"थोड़ी नेकी कर और खूब ढिंढोरा पीट"

और कुछ समय बाद यह यूँ हो जाएगा
"बुरा कर और नेकी का ढिंढोरा पीट"

!! बुद्धिमान लोग तो तीसरे मुकाम पर पहुँच भी गए हैं  !!

Saturday, 30 August 2014

कितना आसान है

कितना आसान है
औरों के  व्यक्तित्व का मुल्यांकन
मिला दिया हाँ में हाँ बढियां हो गया
गर न मिला हाँ में हाँ तो घटिया हो गया

कितना आसान है
औरों के सोच का मुल्यांकन
मिले आपकी सोच से तो बुद्धिमान
और गर न मिले तो मूर्ख

Friday, 29 August 2014

ज़मीं से आसमाँ का मिलन

मुझसे बहुत दूर वहां
आसमाँ झुककर ज़मीं को चूम रहा है
कितना छद्म है यह मिलन
जैसे कि
समंदर के दो किनारो का मिलन
दो विपरीत विचारधाराओं का मिलन

मगर हाँ
आसमाँ का ज़मीं से मिलन
सुखद भी है और
दूर से दीखता भी है

Tuesday, 26 August 2014

सब मिट चुका है

मेरे आखों का अश्क अब तो सूख चुका है
इश्क़ का चमकता सूरज अब तो डूब चुका है

बगैर रूह के जिस्म किसी काम का नहीं
ग़म-ए-ज़ीस्त भी मुझसे अब तो ऊब चुका है

ज़ज्वात की दीवारें औ' प्यार का छत
वो मेरा पुराना आशियाँ अब तो ढह चुका है

ज़माने में अब भारी भीड़ है हुस्नपरश्तों की
यहाँ ज़ज्बात भरा इश्क़ अब तो मिट चुका है

बीच दुपहरी दरख़्त की छाँह में मयवस्ल होता है
पर्दा शर्म-ओ-हया का "धरम" अब तो उठ चुका है