बशर अब अपनी ही शक्ल आईने में पहचानता नहीं है
उसका अपना एक हाथ दूसरे हाथ को जानता नहीं है
साथ निकला तो है मगर पता नहीं साथ जाएगा या नहीं
क़ाफ़िले में रहना साथ चलना अब कोई ठानता नहीं है
सितारे यहाँ अब अपनी रौशनी से कभी चमकते नहीं हैं
किसी का पता पाने को अब कोई ख़ाक छानता नहीं है
काग़ज़ की उड़ान है आसमाँ से कुछ बूँदें ही काफ़ी हैं
कोई भी शिकारी वहाँ तीर-ओ-कमान तानता नहीं है
यहाँ कैसी मिट्टी है मलते ही कालिख़ जमने लगती है
कि जान-बूझ कर कोई मिट्टी से चेहरा सानता नहीं है
बात कोई भी हो बस बयान की तरह ही दर्ज़ होती है
अब वह 'धरम' किसी और को आदमी मानता नहीं है
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