Monday, 16 January 2012

वह बूढ़ा बरगद

दुर्गा स्थान के प्रांगन का
एक बूढ़ा बरगद
हमारे पुराने सभ्यता की
गवाही देता था
जिसकी विशाल भुजाओं में
हमारी कुछ संस्कृति सुरक्षित थी

उस पेड़ के छाहँ में कभी
सुहागिने अपने सुहाग के
दीर्घ जीवन की कामना करती थी
और वह बरगद पितामह की तरह
अपने दोनों हाथों से आशीर्वाद देता था
जिसे सुहागिने अपने आँचल में समेट लेती थी

कुछ लोग कहते हैं, वह बरगद बीमार हो गया था
और उसके पेट में एक धोधर भी हो गया था
तब गाँव के लोगों के बीच बैठक हुई
फिर बरगद की नीलामी लगाई गई

बात तय हुई कि पहले बरगद का हाथ कटा जाय
फिर कमर तोड़ी जाय
और फिर अस्तित्व विहीन कर दिया जाय
बैठक के इस नतीज़े पर कुछ आखें नम भी हुई
मगर काम पूरा कर दिया गया 

अब उस जगह कि मिट्टी पर फर्श बन गया है
जिसपर थोडा राजनीती का रंग भी चढ़ गया है
जब भी उधर से गुजरता हूँ
एक कसक सी होती है
और ऐसा महसूस होता है
कि वह जगह बिलकुल वीरां हो गया है
जबकि वहां भीड़ अब भी जवां है

1 comment:

  1. bahut hi achha..purani yaad taja ho gayi..wakai me bahut emotion hai in sabdaun me..

    ReplyDelete

Note: only a member of this blog may post a comment.