Tuesday, 11 June 2013

फेंका गया मुझे

हर बार मेरे ही ज़ख्म में पिरोया गया मुझे
जो कराहा तो फिर से सताया गया मुझे
अपने बदन के टुकड़ों को जो मैंने समेटा
तो फिर से दुगुने टुकड़ों में काटा गया मुझे

हर बार मेरे ही लहू में डुबाया गया मुझे
जो बच के निकला तो तडपाया गया मुझे 
जंग-ए-तख़्त-ए-सियासत में यहाँ  
अपनी ही मिट्टी से मरहूम किया गया मुझे

हर बार निगाह-ए-हिकारत से देखा गया मुझे  
जो नज़र मिलाया तो बेसबब झुकाया गया मुझे 
फरमान हद-ए-निगाह से दूर जाने का दे दिया गया
जो फिर से देखा गया तो नंगा घुमाया गया मुझे

हर बार मेरे ही आग में जलाया गया मुझे
जो बुझ गया तो फिर से सुलगाया गया मुझे 
कब्र-ए-मुक़र्रर की जमीं भी न दी गई "धरम"
जो मर गया तो काट के फेंका गया मुझे

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