Sunday, 23 February 2014

मकां और घर

बाज़ार से खरीदकर मकां उसको तुम घर कहते हो
मैं जो रहता हूँ तेरे दिल में मुझे तुम बे-घर कहते हो

न जाने किस-किस के हाथों में बिका है यह मकां
देखूं गौर से तो दीखता है हर खरीददार के निशां

उसके लहू की आग में जल उठा था किस-किस का घर
गुजरता हूँ उस कूचे से तो अब मिलता नहीं कोई सजर

न जाने किस मुकाम पर अब ये ज़िंदगी चली गई
पास उसके सिर्फ ग़म है अब तो हर ख़ुशी चली गई

सजाने-सवारने से मकां घर नहीं बन जाता "धरम"
मकां को घर बनाने में लगता है मोहतरम का करम




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