Sunday, 9 February 2014

अब किधर जाएँ हम

सिल गए सारे होंठ अब हर जुबाँ खामोश है
लेकर प्याला लहू का खूब नाचता बदमाश है

गिरा कर रक्त मानव का दानव करता नृत्य है
करती वसुंधरा अफशोस हाय यह कैसा कृत्य है

मुद्रा की शक्ति के आगे अब कांपता महारुद्र है
हर ओर पूजी जाती है लक्ष्मी सरस्वती अब क्षुद्र है

मानवता का रक्षक अपने को बतलाता अब यहाँ गिद्ध है
अब यहाँ से किधर जाएँ हम धर्म का हरेक मार्ग अवरुद्ध है

कुतर कर गरुड़ का पंख उल्लू धर्म का करता प्रचार है
सबला के हाथ में है अबला दिन-रात होता व्यभिचार है

भेंड़ की खाल में छुपकर अब बैठता यहाँ सियार है
घोड़ा से ज्यादा "धरम" अब यहाँ खच्चर होशियार है

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