मेरे प्यारे साथियों "वैलेंटाइन वीक" शुरू हो गया है। हम भारतीयों द्वारा "वैलेंटाइन वीक" मनाना मानसिक
ग़ुलामी की एक और पहचान है। हमारा भारत देश हमेशा से एक स्वच्छ और स्वस्थ सभ्यता का गवाह रहा है। यहाँ के लोग प्यार को सालों भर बांटते आए हैं। यह साप्ताहिक प्यार महज एक दिखावा तथा ढकोशला है। इस छद्म और झूठे प्रदर्शन के लिए युवाओं से ज्यादा उत्साह युवतिओं में देखने को मिलता है। हरेक "वैलेंटाइन डे" को नए सिरे से मनाना आज-कल के युवाओं तथा युवतिओं का शौक हो गया है। इस साल का "वैलेंटाइन डे" किसी के साथ तो अगले साल का किसी दूसरे के साथ, वाह रे "अंग्रेजी प्यार " तुम तो धक् से शुरू होते हो और फ़क पे ख़तम हो जाते हो । यदि यह "अंग्रेजी प्यार " एक साल टिक भी जाये तो यह अपंग तो जरुर हो जाता है तथा बाकि के सालों में बस एक घुटन। ऐसा रिश्ता एक घटिया और बीमारू किस्म का होता है। न तो इस रिश्ते में कोई अपनापन होता है और न ही कोई संवेदना। ऐसा रिश्ता महज एक हवस है जिसमे नंगा नाच ही प्यार के प्रदर्शन का पैमाना बन गया है। जो जितना नंगा होकर नाचेगा उसका प्यार उतना ही गहरा ,टिकाऊ तथा बिकाऊ होगा। यह परिवर्तन हमारे युवा पीढ़ी को दिखावा, बर्बादी तथा नैतिक पतन की ओर द्रुत गति से ले जा रहा है। ऐसी मानसिकता रखने वाले युवाओं-युवतिओं से एक स्वच्छ समाज की कल्पना कैसे की जा सकती है ?
ग़ुलामी की एक और पहचान है। हमारा भारत देश हमेशा से एक स्वच्छ और स्वस्थ सभ्यता का गवाह रहा है। यहाँ के लोग प्यार को सालों भर बांटते आए हैं। यह साप्ताहिक प्यार महज एक दिखावा तथा ढकोशला है। इस छद्म और झूठे प्रदर्शन के लिए युवाओं से ज्यादा उत्साह युवतिओं में देखने को मिलता है। हरेक "वैलेंटाइन डे" को नए सिरे से मनाना आज-कल के युवाओं तथा युवतिओं का शौक हो गया है। इस साल का "वैलेंटाइन डे" किसी के साथ तो अगले साल का किसी दूसरे के साथ, वाह रे "अंग्रेजी प्यार " तुम तो धक् से शुरू होते हो और फ़क पे ख़तम हो जाते हो । यदि यह "अंग्रेजी प्यार " एक साल टिक भी जाये तो यह अपंग तो जरुर हो जाता है तथा बाकि के सालों में बस एक घुटन। ऐसा रिश्ता एक घटिया और बीमारू किस्म का होता है। न तो इस रिश्ते में कोई अपनापन होता है और न ही कोई संवेदना। ऐसा रिश्ता महज एक हवस है जिसमे नंगा नाच ही प्यार के प्रदर्शन का पैमाना बन गया है। जो जितना नंगा होकर नाचेगा उसका प्यार उतना ही गहरा ,टिकाऊ तथा बिकाऊ होगा। यह परिवर्तन हमारे युवा पीढ़ी को दिखावा, बर्बादी तथा नैतिक पतन की ओर द्रुत गति से ले जा रहा है। ऐसी मानसिकता रखने वाले युवाओं-युवतिओं से एक स्वच्छ समाज की कल्पना कैसे की जा सकती है ?
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