Monday, 10 March 2014

ये क्या पाया

अपनी कब्र खोदी ज़िंदा ज़िस्म दफनाया
ज़न्नत की सैर की वहाँ भी न मज़ा पाया

अपना सीना चीरा खुद अपना ही लहू पीया
टुकड़ों में बांटकर ज़िस्म खुद मैंने बिखराया

ये किसकी आह! पर दिल मेरा धड़क आया
ये कौन है जो मेरे बिखरे ज़िस्म को समेट लाया

उड़ जाता हूँ एक फूंक से ये कैसा मैंने ज़िस्म पाया
टूट जाता है दो बे-दिली के हर्फ़ से कैसा मैने दिल पाया

जिसकी साँसों की गर्मी से बदन ठंढा हो जाता है
ऐ ख़ुदा! जो पाया भी तो उसने कैसा महबूब पाया

चीरे हुए दिल का तुम रफू खूब करते हो "धरम"
ख़ुदा से पाया भी ये इल्म तो क्या भला पाया

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