ये लाज़िमी नहीं कि हर बार दुआ-सलाम ही हो
क्यूँ न कभी-कभी हो तो क़त्ल-ए-आम भी हो
ये क्या कि हर बार बस पिलाते हो मय
जो हो तो कभी-कभी नज़र-ए-ज़ाम भी हो
तुम जो हर रोज गुजरती हो मेरी गली से दिन में
क्यूँ न ऐसा हो कि मेरी गली में तेरी शाम भी हो
ये क्या कि हर रोज का यूँ हीं छुप-छुप कर मिलना
अब मिलना हो तो मिलो वहाँ जो राह-ए-आवाम भी हो
वक़्त की पावंदी में हरेक मुलाक़ात मुख़्तसर लगती है
अब की मिलो तो दिन हो शाम हो और शब्-ए-जाम भी हो
यूँ तो तुम हमेशा मेहरबां होते हो हरेक दौलतमंद पर "धरम"
कभी ऐसा भी हो की तुम भी हो और गर्दिश-ए-अय्याम भी हो
क्यूँ न कभी-कभी हो तो क़त्ल-ए-आम भी हो
ये क्या कि हर बार बस पिलाते हो मय
जो हो तो कभी-कभी नज़र-ए-ज़ाम भी हो
तुम जो हर रोज गुजरती हो मेरी गली से दिन में
क्यूँ न ऐसा हो कि मेरी गली में तेरी शाम भी हो
ये क्या कि हर रोज का यूँ हीं छुप-छुप कर मिलना
अब मिलना हो तो मिलो वहाँ जो राह-ए-आवाम भी हो
वक़्त की पावंदी में हरेक मुलाक़ात मुख़्तसर लगती है
अब की मिलो तो दिन हो शाम हो और शब्-ए-जाम भी हो
यूँ तो तुम हमेशा मेहरबां होते हो हरेक दौलतमंद पर "धरम"
कभी ऐसा भी हो की तुम भी हो और गर्दिश-ए-अय्याम भी हो
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