Tuesday, 18 March 2014

कई चेहरे

एक चेहरे के पीछे कई चेहरे छुपाना
सीखा है कहाँ से ये इल्म मुझे भी बताना

अपनों पे सितम ढाना गैरों पे करम करना
मैं खूब जनता हूँ तेरा इल्म तुम मुझे न भरमाना

इश्क़ मोहब्बत यारी ये तेरी सब झूठी बातें हैं
तुम हरज़ाई बनकर अब मुझे न आज़माना

जो छुपे महताब आसमां में तो तेरा इश्क़ फरमाना
जो निकले आफताब तो तेरा सर-ए-आम शर्माना

उसके इश्क़ के चर्चे मैंने भी खूब सुना है "धरम"
कितनों को देखा है बहते दरिया से कतरा हो जाना


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