घुलकर लहू में मैं जो तेरे जिगर में उतर जाऊँ
मैं ताउम्र भटका हूँ अब तेरे दिल में बसर पाऊँ
यूँ ही एक रोज भटकते हुए मैं जो तेरे घर पहुंचा
लौटने लगा तो ये सोचा की जाऊँ तो कहाँ जाऊँ
एक तमन्ना है की तेरे सीने पे सर रखूं सुकूँ पाऊँ
ग़म-ए-दौरां से उब चुका हूँ अब थोड़ी ख़ुशी पाऊँ
ये जिस ख़ुशी की आहट पे मेरा ग़म सो रहा है "धरम"
ग़र वो हो तेरा नाम तो मैं इससे ज्य़ादा और क्या पाऊँ
मैं ताउम्र भटका हूँ अब तेरे दिल में बसर पाऊँ
यूँ ही एक रोज भटकते हुए मैं जो तेरे घर पहुंचा
लौटने लगा तो ये सोचा की जाऊँ तो कहाँ जाऊँ
एक तमन्ना है की तेरे सीने पे सर रखूं सुकूँ पाऊँ
ग़म-ए-दौरां से उब चुका हूँ अब थोड़ी ख़ुशी पाऊँ
ये जिस ख़ुशी की आहट पे मेरा ग़म सो रहा है "धरम"
ग़र वो हो तेरा नाम तो मैं इससे ज्य़ादा और क्या पाऊँ
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