जब भी बुजुर्ग
अपने बच्चों के आखों से ख्वाब देखते हैं
अहा! क्या नज़ारा है
भरी अमावस में भी महताब देखते हैं
उनके अपने चेहरे पर
भले ही झुर्रियां क्यों न फैली हो
मगर हाँ बच्चों के चेहरे पर
वो एक चमकता आफताब देखते हैं
रक्त का वो प्रवाह जो पत्थर को भी चूर कर दे
उनकी धमनियों में अब ठंढा पड़ गया है
बच्चे को भरकर अपने अंक में
रक्त के उस प्रवाह को महसूस करते हैं
अपने बच्चों के आखों से ख्वाब देखते हैं
अहा! क्या नज़ारा है
भरी अमावस में भी महताब देखते हैं
उनके अपने चेहरे पर
भले ही झुर्रियां क्यों न फैली हो
मगर हाँ बच्चों के चेहरे पर
वो एक चमकता आफताब देखते हैं
रक्त का वो प्रवाह जो पत्थर को भी चूर कर दे
उनकी धमनियों में अब ठंढा पड़ गया है
बच्चे को भरकर अपने अंक में
रक्त के उस प्रवाह को महसूस करते हैं
No comments:
Post a Comment
Note: only a member of this blog may post a comment.