हर रंग में रंगा मगर जीने का न कोई अंदाज़ आया
अब मुझे मेरे हाल पर छोड़ दे मैं तुझसे बाज आया
जो उछाला था पत्थर मैंने उसे अपने ही सर पाया
हर ख़ुशी पे ग़म खाया औ" हर ग़म में मुस्कुराया
मेरा ज़नाज़ा-ए-इश्क़ तो तेरे ही दर से होकर आया
गुरूर-ए-हुस्न के नशे में तुमको ये न नज़र आया
अपने सीने का लहू मैं तेरे घर के चिराग में भर आया
मेरे जलते लहू का रंग भी अब तुझपर बे-असर आया
मेरे मर्ज़ की कोई दवा न थी औ" दुआ भी बे-असर पाया
कि खुद अपने मरने का गैरों से जब मैंने ये खबर पाया
मज़ार-ए-इश्क़ के बगल में "धरम" खुद अपनी कब्र खोद आया
ता-उम्र तन्हाई में रहा और बाद मरने के ये रिश्ता जोड़ आया
अब मुझे मेरे हाल पर छोड़ दे मैं तुझसे बाज आया
जो उछाला था पत्थर मैंने उसे अपने ही सर पाया
हर ख़ुशी पे ग़म खाया औ" हर ग़म में मुस्कुराया
मेरा ज़नाज़ा-ए-इश्क़ तो तेरे ही दर से होकर आया
गुरूर-ए-हुस्न के नशे में तुमको ये न नज़र आया
अपने सीने का लहू मैं तेरे घर के चिराग में भर आया
मेरे जलते लहू का रंग भी अब तुझपर बे-असर आया
मेरे मर्ज़ की कोई दवा न थी औ" दुआ भी बे-असर पाया
कि खुद अपने मरने का गैरों से जब मैंने ये खबर पाया
मज़ार-ए-इश्क़ के बगल में "धरम" खुद अपनी कब्र खोद आया
ता-उम्र तन्हाई में रहा और बाद मरने के ये रिश्ता जोड़ आया
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