Saturday, 2 May 2015

मैंने तुमको थाम लिया

हरेक बार गिरने से पहले मैंने तुमको थाम लिया
खुद अपने सर तेरे सारे गुनाहों का इल्ज़ाम लिया

अकीदत भरे अल्फ़ाज़ से सिर्फ मैंने तेरा नाम लिया
उस बज़्म में तो हरेक ने बस तुमको बदनाम किया

भूली-बिसरी यादों को लिखकर मैंने तुमको पैगाम दिया
एक-एक हर्फ़ को झुठलाकर तुमने मुझपर इल्ज़ाम दिया

तोड़कर मुझसे अपना वादा तुमने यह कैसा काम किया
मेरे ही बज़्म में मोहब्बत को रुस्वा तुमने सरेआम किया

कि झटककर साक़ी के हाथों से जो तुमने मेरा ज़ाम लिया
मुद्दतों बाद जो मिली थी मुझको तुमने वो भी शाम लिया

हैरत है मुझको कि तुमने तन्हाई से डरने का न नाम लिया
हर मोहब्बत को ठुकराकर "धरम" उल्टा बस बदनाम किया  

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