1.
हक़ीकत के कन्धों पर मेरे ख्वाइशों का जनाज़ा है
और वो कब्रगाह महज चंद कदमों के फासले पर है
2.
मुझे ऐतवार का सिला सिर्फ ज़ख्म से मिला
औ" सुकूँ भी नहीं किसी के बज़्म में मिला
3.
इस कस्ती को अब यहाँ न कोई किनारा नसीब है
भीड़ में तो सब दोस्त हैं मगर कहाँ कोई करीब है
4.
उन टुकड़ों में मिले ज़ख्मों का अंदाज़ बड़ा नायब था
मानो एक ख्वाब के बाद जैसा कोई दूसरा ख्वाब था
5.
अपने सीने में खुद ही आग लगाये बैठे हैं
कैसे लोग हैं खुद को अंदर से जलाये बैठे हैं
हक़ीकत के कन्धों पर मेरे ख्वाइशों का जनाज़ा है
और वो कब्रगाह महज चंद कदमों के फासले पर है
2.
मुझे ऐतवार का सिला सिर्फ ज़ख्म से मिला
औ" सुकूँ भी नहीं किसी के बज़्म में मिला
3.
इस कस्ती को अब यहाँ न कोई किनारा नसीब है
भीड़ में तो सब दोस्त हैं मगर कहाँ कोई करीब है
4.
उन टुकड़ों में मिले ज़ख्मों का अंदाज़ बड़ा नायब था
मानो एक ख्वाब के बाद जैसा कोई दूसरा ख्वाब था
5.
अपने सीने में खुद ही आग लगाये बैठे हैं
कैसे लोग हैं खुद को अंदर से जलाये बैठे हैं
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