जो मील का पत्थर था वो अपने ज़गह से हिला नहीं
की पूरा कारवां गुज़र गया मगर उससे कोई मिला नहीं
उसकी ख्वाईश की सीढ़ी आसमाँ से भी ऊँची निकल गई
हाँ मगर हक़ीक़त यह हुआ की वहां कोई महल बना नहीं
की हिम्मत हर बार मुफ़लिसी के सामने घुटने टेक देती है
आज फिर से उसके सितम पर इसका कोई ज़ोर चला नहीं
हुक़्म की ग़ुलामी औ" एहसान तले झुका हुआ उसका सर
की आज कट भी जाये तो उसको खुद पर कोई गिला नहीं
तारों-सितारों की बातें आसमानी हैं कुछ हक़ीक़त नहीं होता
अब समझ आया की ऐतवार करके मिलता कोई सिला नहीं
इस बार के गर्दिश-ए-ऐय्याम को झुककर सलाम करना है
उसके सामने अकड़कर खड़ा रहने में 'धरम' कोई भला नहीं
की पूरा कारवां गुज़र गया मगर उससे कोई मिला नहीं
उसकी ख्वाईश की सीढ़ी आसमाँ से भी ऊँची निकल गई
हाँ मगर हक़ीक़त यह हुआ की वहां कोई महल बना नहीं
की हिम्मत हर बार मुफ़लिसी के सामने घुटने टेक देती है
आज फिर से उसके सितम पर इसका कोई ज़ोर चला नहीं
हुक़्म की ग़ुलामी औ" एहसान तले झुका हुआ उसका सर
की आज कट भी जाये तो उसको खुद पर कोई गिला नहीं
तारों-सितारों की बातें आसमानी हैं कुछ हक़ीक़त नहीं होता
अब समझ आया की ऐतवार करके मिलता कोई सिला नहीं
इस बार के गर्दिश-ए-ऐय्याम को झुककर सलाम करना है
उसके सामने अकड़कर खड़ा रहने में 'धरम' कोई भला नहीं
वाह!! बहुत शानदार...
ReplyDeleteThanks
ReplyDeleteपत्थर ही धड़कते हैं, आबाद शहर के हर एक सीने में,
ReplyDeleteआदमी टूट-टूट के बिखरा, आज कोई दिल पिघला नहीं।
खैर, खुद ही समेट लेगा, अपने मुकम्मल कारवां को,
ग़र घर से निकला, तो मंझिल से कोई फासला नहीं।