Friday, 28 July 2017

खुद ही इससे भरमाता हूँ

कहाँ से लिखना शुरू करूँ खुद में ही उलझ जाता हूँ
कि तेरे प्रत्येक मुलाक़ात को मैं हमेशा पूरा पाता हूँ

तेरे साथ बिताए वक़्त को मैं हर रोज गुनगुनाता हूँ
ये कैसा आज़ार है कि तेरी बातें तुझको ही सुनाता हूँ

अब रूठकर क्या हासिल होगा ये समझ नहीं पाता हूँ
औ" ग़र करूँ तेरी तारीफ़ तो भी मैं तुझको न भाता हूँ

उतार दूँ क़र्ज़ तुम्हारा लो मैं खुद को तुझपर लुटाता हूँ
ये लो मेरी गर्दन कि अब मैं तुझसे शिकस्त ही खाता हूँ

दोनों के बीच के फासले को "धरम" कम नहीं कर पाता हूँ
तुम हक़ीक़त हो या कल्पना मैं खुद ही इससे भरमाता हूँ 

Thursday, 27 July 2017

किस तरह से ये हौशला रखा

क्यूँ कर हमेशा तुमने दो कदम का फ़ासला रखा
पहलू में आने-जाने का लगातार सिलसिला रखा

कभी मिलने पर असीम ख़ुशी कभी तो सिर्फ बेरुख़ी
कि कैसे तुमने बनाकर मुझे महज़ एक मामला रखा  

कि जिस बात पर हँसे ठीक उसी बात पर रो भी दिए
कैसे अपने मिजाज़ में इस तरह का तबादला रखा

मेरे हर हुनर पे तेरी आखों का एक बूँद पानी भारी था
कि अपने अश्क़ को मेरे लिए बनाकर जलजला रखा

कि तेरी सासें मेरा जिस्म औ" मेरी सासें तेरा जिस्म
बाद इसके भी तुमने इश्क़ का कोई और मरहला रखा

कि इश्क़ का क़त्ल करके हुस्न के बुलंदी तक पहुंचे
किस तरह से "धरम" तुमने खुद में ये हौशला रखा 

Sunday, 23 July 2017

और क्या अंजाम लिखूँ

कि अब मुझे तुम ही बता कैसे तुझे सलाम लिखूँ
तेरे दिल के किस कोने में खुद अपना नाम लिखूँ

कि अपनी ज़ुल्फ़ों में लपेटो मुझे बाहों में थाम लो
इसके अलावा अपने लिए और क्या कलाम लिखूँ

कि हो बाहों में बाहें औ" रहे सदा अपनी आखें चार
तू ही बता कि इस रिश्ते का और क्या आयाम लिखूँ

कि कभी कोई कश्मकश न हो औ" न हो कोई इल्ज़ाम
तेरे लिए मैं अपनी तरफ से हमेशा यही पैगाम लिखूँ

कि मैं मरुँ तो तेरी बाहों में औ" तू मरो तो मेरे सीने पर
इस रिश्ते का "धरम" मैं अब और क्या अंजाम लिखूँ 

Thursday, 20 July 2017

क्या रहा होगा क्या न रहा होगा

दिल पत्थर का ही क्यूँ न हो मगर उसमें रास्ता रहा होगा
यहाँ ऐसा कौन है जिसका दर्द से कभी वास्ता न रहा होगा

कि ख़ुमारी में झूमे औ" जब उतरी ख़ुमारी तो फूटकर रोए
कैसे कहें कि ऐसे शख़्स का किसी से कोई रिश्ता न रहा होगा

अभी हँसे अभी ही रो भी दिए कि ग़म-ए-मोहब्बत भी अजीब है
ऐ! इश्क़ तुझसे जुड़ने से बिछड़ने का सफर सस्ता न रहा होगा

वफ़ा की बात पर न जाने क्यूँ हमेशा दोनों में तक़रार ही हुई
कि उसका हुस्न कभी भी इसके इश्क़ पर हल्का न रहा होगा

कि आग औ" पानी की बारिश देखकर ज़माना घर लौट गया
हम बस सोचते रहे "धरम" कि क्या रहा होगा क्या न रहा होगा

Sunday, 16 July 2017

चंद शेर

1.
जब भी मैंने तुमको याद किया अपने आप को पूरा पाया
औ" ग़र भूला तुझको "धरम" तो खुद को ही अधूरा पाया

2.
कौन सा रंग भरूँ कितना ज़ख्म रखूं कैसा गीत गाऊँ
"धरम" मुझे अब तू ही बता की कैसे तुझे क़रीब पाऊँ

3.
मुझको मुझ ही से खरीदकर मुझको ही बेचा गया
खुद अपने ही दर पर "धरम" नीलाम हो गया हूँ मैं

4.
अब बस एक बार आओ "धरम" तुम मिलो मुझसे बे-सबब ही सही
मत रखो कोई तहजीब-ए-मुलाक़ात मिलो मुझसे बे-अदब ही सही

5.
अभी ख़्याल आय था तेरा फिर उसी अदा से हिचकोले खाते हुए
सांस ठहरी थी जिस्म ठंढा था "धरम" तुम चली दिल दुखाते हुए

6.
कि बाद इस सफर के 'धरम' ज़ीस्त में कोई फ़िज़ा बाकी नहीं रहेगी
न ही कोई मंज़िल-ए-मक़सूद रहेगी औ" न ही कोई आशियाँ रहेगा

7.
तेरे दिल के हरेक ठिकाने का "धरम" मुझको खबर रहता है
तेरी याद दिल में रहती है कुछ बोलूं तो जुबां पे असर रहता है

8.
ऐसा क़रम बरसा ऐ मौला! कि किसी का क़द किसी के कम न रहे
औ" इस ज़माने में "धरम" किसी के दिल में कोई भी ग़म न रहे