1.
जब भी मैंने तुमको याद किया अपने आप को पूरा पाया
औ" ग़र भूला तुझको "धरम" तो खुद को ही अधूरा पाया
2.
कौन सा रंग भरूँ कितना ज़ख्म रखूं कैसा गीत गाऊँ
"धरम" मुझे अब तू ही बता की कैसे तुझे क़रीब पाऊँ
3.
मुझको मुझ ही से खरीदकर मुझको ही बेचा गया
खुद अपने ही दर पर "धरम" नीलाम हो गया हूँ मैं
4.
अब बस एक बार आओ "धरम" तुम मिलो मुझसे बे-सबब ही सही
मत रखो कोई तहजीब-ए-मुलाक़ात मिलो मुझसे बे-अदब ही सही
5.
अभी ख़्याल आय था तेरा फिर उसी अदा से हिचकोले खाते हुए
सांस ठहरी थी जिस्म ठंढा था "धरम" तुम चली दिल दुखाते हुए
6.
कि बाद इस सफर के 'धरम' ज़ीस्त में कोई फ़िज़ा बाकी नहीं रहेगी
न ही कोई मंज़िल-ए-मक़सूद रहेगी औ" न ही कोई आशियाँ रहेगा
7.
तेरे दिल के हरेक ठिकाने का "धरम" मुझको खबर रहता है
तेरी याद दिल में रहती है कुछ बोलूं तो जुबां पे असर रहता है
8.
ऐसा क़रम बरसा ऐ मौला! कि किसी का क़द किसी के कम न रहे
औ" इस ज़माने में "धरम" किसी के दिल में कोई भी ग़म न रहे
जब भी मैंने तुमको याद किया अपने आप को पूरा पाया
औ" ग़र भूला तुझको "धरम" तो खुद को ही अधूरा पाया
2.
कौन सा रंग भरूँ कितना ज़ख्म रखूं कैसा गीत गाऊँ
"धरम" मुझे अब तू ही बता की कैसे तुझे क़रीब पाऊँ
3.
मुझको मुझ ही से खरीदकर मुझको ही बेचा गया
खुद अपने ही दर पर "धरम" नीलाम हो गया हूँ मैं
4.
अब बस एक बार आओ "धरम" तुम मिलो मुझसे बे-सबब ही सही
मत रखो कोई तहजीब-ए-मुलाक़ात मिलो मुझसे बे-अदब ही सही
5.
अभी ख़्याल आय था तेरा फिर उसी अदा से हिचकोले खाते हुए
सांस ठहरी थी जिस्म ठंढा था "धरम" तुम चली दिल दुखाते हुए
6.
कि बाद इस सफर के 'धरम' ज़ीस्त में कोई फ़िज़ा बाकी नहीं रहेगी
न ही कोई मंज़िल-ए-मक़सूद रहेगी औ" न ही कोई आशियाँ रहेगा
7.
तेरे दिल के हरेक ठिकाने का "धरम" मुझको खबर रहता है
तेरी याद दिल में रहती है कुछ बोलूं तो जुबां पे असर रहता है
8.
ऐसा क़रम बरसा ऐ मौला! कि किसी का क़द किसी के कम न रहे
औ" इस ज़माने में "धरम" किसी के दिल में कोई भी ग़म न रहे
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