Friday, 28 July 2017

खुद ही इससे भरमाता हूँ

कहाँ से लिखना शुरू करूँ खुद में ही उलझ जाता हूँ
कि तेरे प्रत्येक मुलाक़ात को मैं हमेशा पूरा पाता हूँ

तेरे साथ बिताए वक़्त को मैं हर रोज गुनगुनाता हूँ
ये कैसा आज़ार है कि तेरी बातें तुझको ही सुनाता हूँ

अब रूठकर क्या हासिल होगा ये समझ नहीं पाता हूँ
औ" ग़र करूँ तेरी तारीफ़ तो भी मैं तुझको न भाता हूँ

उतार दूँ क़र्ज़ तुम्हारा लो मैं खुद को तुझपर लुटाता हूँ
ये लो मेरी गर्दन कि अब मैं तुझसे शिकस्त ही खाता हूँ

दोनों के बीच के फासले को "धरम" कम नहीं कर पाता हूँ
तुम हक़ीक़त हो या कल्पना मैं खुद ही इससे भरमाता हूँ 

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