Sunday, 23 July 2017

और क्या अंजाम लिखूँ

कि अब मुझे तुम ही बता कैसे तुझे सलाम लिखूँ
तेरे दिल के किस कोने में खुद अपना नाम लिखूँ

कि अपनी ज़ुल्फ़ों में लपेटो मुझे बाहों में थाम लो
इसके अलावा अपने लिए और क्या कलाम लिखूँ

कि हो बाहों में बाहें औ" रहे सदा अपनी आखें चार
तू ही बता कि इस रिश्ते का और क्या आयाम लिखूँ

कि कभी कोई कश्मकश न हो औ" न हो कोई इल्ज़ाम
तेरे लिए मैं अपनी तरफ से हमेशा यही पैगाम लिखूँ

कि मैं मरुँ तो तेरी बाहों में औ" तू मरो तो मेरे सीने पर
इस रिश्ते का "धरम" मैं अब और क्या अंजाम लिखूँ 

No comments:

Post a Comment

Note: only a member of this blog may post a comment.