शायद कोई शाख़ टूटा होगा वहां
दरख़्तों के रोने की आवाज़ आ रही थी
ये आवाज़ हर कोई सुन नहीं सकता
ये बुलंद नहीं होती
बस एक सिसकी होती है निकल जाती है
दरख़्तों के अश्क़
आखों में ही सूख जाते हैं
चेहरे पर उगी झुर्रियों तक नहीं पहुंचते
कराह की आवाज़
हलक़ से ऊपर तक नहीं आती
होंठ बस काँप के रह जाते हैं
क्या जानें कुछ कहना चाहते हैं
दरख़्तों के रोने की आवाज़ आ रही थी
ये आवाज़ हर कोई सुन नहीं सकता
ये बुलंद नहीं होती
बस एक सिसकी होती है निकल जाती है
दरख़्तों के अश्क़
आखों में ही सूख जाते हैं
चेहरे पर उगी झुर्रियों तक नहीं पहुंचते
कराह की आवाज़
हलक़ से ऊपर तक नहीं आती
होंठ बस काँप के रह जाते हैं
क्या जानें कुछ कहना चाहते हैं
No comments:
Post a Comment
Note: only a member of this blog may post a comment.