Monday, 2 October 2017

जान से मारा नहीं मुझे

तुमने भी कभी शौक से पुकारा नहीं मुझे
औ" यूँ ही कहीं भी जाना गँवारा नहीं मुझे

तुम क्यों ही पूछते हो मेरे उदासी का सबब
जब तुमने कभी रूककर सँवारा नहीं मुझे

ज़माना तो चाहता था की मैं ज़िंदा ही रहूं
पर तुमने भी क्यूँ  जान से मारा नहीं मुझे

ज़माने के बिसात पर मैं तो एक मोहरा ही था
क्या कहें की किस किस ने उतारा नहीं मुझे

वफ़ा तुम्हारे नाम की जलन आँख की रही
ऐसे आग से करना कोई किनारा नहीं मुझे

कि इसबार गिर के मैं तो खुद से ही उठा हूँ
"धरम" चाहिए अब कोई सहारा नहीं मुझे 

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