कभी तो हम यार थे मगर अब जो मिलेंगे तो अनजान बनकर मिलेंगे
एक ही ज़िस्म में क्यूँ न रहें मगर अलग-अलग जान बनकर मिलेंगे
न कभी मैं तेरे पंख लगाकर उड़ूँ न कभी तुम ही मेरे ज़िस्म में उतरना
आमने सामने भी दोनों अब तो अलग-अलग पहचान बनकर मिलेंगे
न तुम मुझे कभी आँखों से पिलाना न मैं कभी तेरे रूह को महसूस करूँ
ग़र अकेले में भी मिलेंगे तो दोनों बदन की साँसें बेजान बनकर मिलेंगे
महज़ रिश्ता के मरने से सिर्फ नजदीकी ही घटती है फ़ासला नहीं बढ़ता
अब जो हम दोनों मिलेंगे 'धरम' तो बे-वफ़ा औ" बे-ईमान बनकर मिलेंगे
एक ही ज़िस्म में क्यूँ न रहें मगर अलग-अलग जान बनकर मिलेंगे
न कभी मैं तेरे पंख लगाकर उड़ूँ न कभी तुम ही मेरे ज़िस्म में उतरना
आमने सामने भी दोनों अब तो अलग-अलग पहचान बनकर मिलेंगे
न तुम मुझे कभी आँखों से पिलाना न मैं कभी तेरे रूह को महसूस करूँ
ग़र अकेले में भी मिलेंगे तो दोनों बदन की साँसें बेजान बनकर मिलेंगे
महज़ रिश्ता के मरने से सिर्फ नजदीकी ही घटती है फ़ासला नहीं बढ़ता
अब जो हम दोनों मिलेंगे 'धरम' तो बे-वफ़ा औ" बे-ईमान बनकर मिलेंगे
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