जो जल के फिर से बुझा तो बुझने का सलीका भूल गया
रौशनी के दर पर उपजा अँधेरा अपना ईलाका भूल गया
जिसको तराशा इन्सां बनाया तालीम दी आसमाँ दिखाया
आज महज़ एक ही बुलंदी पाई वो अपना आक़ा भूल गया
दिल-ए-समंदर में जब भी हलचल हुई तासीर रूह तक हुई
निगल कर रूह को सैलाब ख़ुद अपना ही ख़ाका भूल गया
दिल मोम था तपिश अपनी थी साथ ज़माना था तो यूँ हुआ
मोम ख़ुद से तपकर "धरम" पिघलने का तरीका भूल गया
रौशनी के दर पर उपजा अँधेरा अपना ईलाका भूल गया
जिसको तराशा इन्सां बनाया तालीम दी आसमाँ दिखाया
आज महज़ एक ही बुलंदी पाई वो अपना आक़ा भूल गया
दिल-ए-समंदर में जब भी हलचल हुई तासीर रूह तक हुई
निगल कर रूह को सैलाब ख़ुद अपना ही ख़ाका भूल गया
दिल मोम था तपिश अपनी थी साथ ज़माना था तो यूँ हुआ
मोम ख़ुद से तपकर "धरम" पिघलने का तरीका भूल गया
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