Monday, 12 November 2018

अपना आक़ा भूल गया

जो जल के  फिर से बुझा  तो बुझने  का  सलीका भूल गया
रौशनी के  दर पर  उपजा अँधेरा  अपना  ईलाका भूल गया

जिसको तराशा  इन्सां बनाया  तालीम दी आसमाँ दिखाया
आज महज़  एक ही बुलंदी  पाई वो  अपना आक़ा भूल गया

दिल-ए-समंदर में  जब भी  हलचल हुई तासीर रूह तक हुई
निगल कर  रूह को  सैलाब ख़ुद अपना ही  ख़ाका भूल गया

दिल मोम था तपिश अपनी थी साथ ज़माना था तो यूँ हुआ 
मोम ख़ुद से  तपकर "धरम" पिघलने  का तरीका भूल गया

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