Saturday, 23 July 2022

ख़ुद से एक भी चराग़ बुझा न सका

क्यूँ कभी एक भी दर्द  इंतिहा तक  आ न सका 
ऐसा क्यूँ की एक भी साँस सीने में समा न सका
 
यूँ  ख़ून-ओ-पसीना  साथ-साथ कई बार निकला 
कभी अपना ख़ून अपने पसीने से मिला न सका
 
चेहरे के एक-एक हर्फ़ को पढ़ा भी  भुलाया भी  
मगर एक भी हर्फ़-ए-ख़ुफ़्ता कभी भुला न सका 

किसी का कद बढ़ा दिया किसी का छोटा किया 
मगर एक कद को वो दूसरे कद से मिला न सका 
 
यूँ तो अनगिनत लम्हें दिल की पनाह में थे मगर  
किसी एक भी लम्हा को  सुकूँ से  सुला न सका 

यूँ तो वो सारा चराग़ हवा की ज़द में न था मगर 
कभी ख़ुद से 'धरम' एक भी चराग़ बुझा न सका 

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