न तो मसरूफ़ रहता हूँ न ही फ़ुर्सत में रहता हूँ
अपना त'आरुफ़ मैं कुछ इस तरह से कहता हूँ
अपना त'आरुफ़ मैं कुछ इस तरह से कहता हूँ
जब भी ज़ख़्म मोहब्बत का ढ़लने लगता है तब
रखकर कलेजा कील पर मैं कुछ दर्द गढ़ता हूँ
एक तो तन्हा आईना उसमें मेरा वो तन्हा शक्ल
अक्स औ" आईने को मैं एक धागे में सिलता हूँ
आँखों से आँखें जब मिली रूह तक पथरा गई
कि किसके चेहरे में मैं अपना चेहरा पढ़ता हूँ
मिलें तो ख़फ़ा होना न मिलें तो बे-वफ़ा होना
हरेक इश्क़ में ये इनाम मैं दिन-रात सहता हूँ
ग़र कोई कल हो तो क्यूँकर हो किसलिए हो
उम्र भर का दर्द 'धरम' जब मैं आज रखता हूँ
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