कोई रौशनी को क़ैद न करे पूरा उजाला होने दे
सरज़मीं जो भी पैदा करे सबका निवाला होने दे
ऐ ख़ुदा कुछ और इल्म दे इंसानियत काफ़ी नहीं
जिस्म को तू कर काशी दिल को शिवाला होने दे
कि तख़्तनशीं ग़र भूल बैठे धर्म क्या है तख़्त का
तू खींच ले रहमत अपनी उसका दिवाला होने दे
हर्फ़ है या है ज़िंदगी तू कर फ़ैसला इंकार न कर
ग़र तू नहीं तो ख़ुद को ख़ुद का रखवाला होने दे
फ़िज़ा में घोलकर ख़ुशबू रंग बहार का दे 'धरम'
क़यामत तक इंसानियत का एक प्याला होने दे
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