कि हर वक़्त ख़ामोश रहता है नशे में चूर रहता है
ये दिल धड़कता तो है मगर बहुत मजबूर रहता है
इल्म है पहले इश्क़ करता है फिर क़त्ल करता है
वो एक ऐसा क़ातिल तो जो बहुत मशहूर रहता है
सादा काग़ज़ पर बिना वादा के दस्तख़त करता है
वो कैसा शख़्स है जिसे हर फ़ैसला मंज़ूर रहता है
जो आग़ोश में होकर भी एक फ़ासले पर रहता है
वो ऐसा मर्ज़ है जैसे बिना ज़ख़्म के नासूर रहता है
गर्म साँसें थी थोड़ी उलफ़त थी थोड़ा फ़साना था
ये कैसा ख़्वाब है हक़ीक़त से हमेशा दूर रहता है
"धरम" कितनी भी सफ़ाई से क्यूँ न मिलूं किसी से
बाद मुलाक़ात के चेहरे पर ग़ुबार जरूर रहता है
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