Thursday, 17 November 2022

हर फ़ैसला मंज़ूर रहता है

कि हर वक़्त ख़ामोश रहता है नशे में चूर रहता है
ये दिल धड़कता तो है मगर बहुत मजबूर रहता है

इल्म है पहले इश्क़ करता है फिर क़त्ल करता है 
वो एक ऐसा क़ातिल तो जो बहुत मशहूर रहता है 

सादा काग़ज़ पर बिना वादा के दस्तख़त करता है    
वो कैसा शख़्स है  जिसे हर फ़ैसला मंज़ूर रहता है

जो आग़ोश में होकर भी  एक फ़ासले पर रहता है 
वो ऐसा मर्ज़ है जैसे बिना ज़ख़्म के नासूर रहता है  

गर्म साँसें थी  थोड़ी उलफ़त थी थोड़ा फ़साना था  
ये कैसा ख़्वाब है हक़ीक़त से हमेशा दूर रहता है  

"धरम" कितनी भी सफ़ाई से क्यूँ न मिलूं किसी से 
बाद मुलाक़ात के चेहरे पर  ग़ुबार जरूर रहता है 

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