Wednesday, 15 March 2023

चेहरों का दस्ता रखा

दरिया में जब भी उतरा  किनारे से वाबस्ता रखा
मौजों से दिल भी लगाया साँस भी आहिस्ता रखा

जिसे सितम कहा था  वो वक़्त का एक करम था 
ख़ार के जिल्द में ब-तौर ख़त एक गुलदस्ता रखा

इबादत भी किया  मगर कभी कोई ख़ुदा न रखा 
औ" ज़िंदगी की राह में हर कदम बरजस्ता रखा

सिर्फ़ नाम याद रहा चेहरा ख़याल आया ही नहीं
आईने ने भी अक्स हमेशा चेहरों का दस्ता रखा

मोहब्बत में क़त्ल बाक़ी और क़त्ल से अलग था 
ज़िबह के बाद भी  सिर को धड़ से पैवस्ता रखा 

अजब तौर-ए-इश्क़ था सनम था की ज़माना था 
दिल को दिमाग़ से 'धरम' मुसलसल बस्ता रखा      
 

वाबस्ता : आबद्ध (जुड़ाव)
आहिस्ता : धीरे-धीरे
गुलदस्ता : फूलों का गुच्छा  
बरजस्ता : बिना सोचे 
दस्ता : समूह
पैवस्ता : जुड़ा हुआ
बस्ता : बंधा हुआ 

No comments:

Post a Comment

Note: only a member of this blog may post a comment.