कि ये ग़म महज़ एक शाम में भुलाया नहीं जा सकता
दिल को यूँ किसी भी आग में जलाया नहीं जा सकता
दिल को यूँ किसी भी आग में जलाया नहीं जा सकता
अपनी गुस्ताख़ी अपना इंसाफ़ औ"अपनी ही मुंसिफ़ी
कैसे कहें ख़ुद पर कभी हाथ उठाया नहीं जा सकता
ये कभी ना ख़त्म होने वाला सफ़र-ए-दश्त-ए-तारीक़ी
कैसे कह दें कोई और कदम बढ़ाया नहीं जा सकता
ये तौर-ए-महफ़िल की बोलने के लिए मजबूर करना
औ" ये हुक्म कि वापस फिर बिठाया नहीं जा सकता
बहार को ये वसूक़ की रंग-ए-फ़िज़ा क़ायम ही रहेगा
ख़िज़ाँ को ये मालूम और रंग उड़ाया नहीं जा सकता
कुछ तो यूँ ही दिल के क़रीबी की ख़ुश-फ़हमी 'धरम'
एक और ये भरम की कभी दूर जाया नहीं जा सकता
No comments:
Post a Comment
Note: only a member of this blog may post a comment.