दरवाज़ा कदमों की आहट से यह याद करता है
हर रोज़ एक शख़्स यहाँ क्यूँ फ़रियाद करता है
वो शख़्स तो एक समंदर भी है एक प्यास भी है
रोज़ अश्क़ों से उजड़ा गुलशन आबाद करता है
जब चेहरा परदे में रहा दिल सीने के बाहर रहा
ये दिल ज़माने पर यूँ इस तरह बेदाद करता है
ख़यालों की दुनियाँ है वो ख़्वाबों का आशिक़ है
वो शख़्स ख़ुद अपना भी कहाँ मफ़ाद करता है
एक कैसी शाम हुई दिन फिर कभी न निकला
ये कैसा इश्क़ है क्यूँ इस तरह रूदाद करता है
आँखों में लहू उतारता है रगों में पानी बहाता है
'धरम' सुकूँ का ये कैसा तरीक़ा ईजाद करता है
फ़रियाद : न्याय-याचना
आबाद : ख़ुशहाल
बेदाद : ज़ुल्म
मफ़ाद : भलाई
रूदाद : हाल/कहानी
ईजाद : अविष्कार
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