Tuesday, 4 April 2023

दिल कितना दुखाया रहा

आँखों में हमेशा वो कुछ इस तरह समाया रहा  
वो नहीं रहा तो कभी अक्स तो कभी साया रहा

मुड़कर देखना आसान न था बिछड़ने के बाद  
रुख़्सत के बाद भी वो हाथ अपना बढ़ाया रहा
  
ख़्वाब में मिलने का एक अहद किया था कभी 
वो आँखें बंद करके नज़र अपनी बिछाया रहा
 
वा'दा-ख़िलाफ़ी के बाद एक घाव उभर आता   
वो सीने पर हाथ रखकर ज़ख़्म दफ़नाया रहा

वो क़ातिल भी था मसीहा भी था  ख़ुदा भी था 
जब गले लगाया तो दिल कितना दुखाया रहा
  
साथ चला तो एक भीड़ थी कोई कारवाँ न था  
हाथ थाम कर भी 'धरम' हर कोई पराया रहा 

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