आँखों में हमेशा वो कुछ इस तरह समाया रहा
वो नहीं रहा तो कभी अक्स तो कभी साया रहा
मुड़कर देखना आसान न था बिछड़ने के बाद
रुख़्सत के बाद भी वो हाथ अपना बढ़ाया रहा
ख़्वाब में मिलने का एक अहद किया था कभी
वो आँखें बंद करके नज़र अपनी बिछाया रहा
वा'दा-ख़िलाफ़ी के बाद एक घाव उभर आता
वो सीने पर हाथ रखकर ज़ख़्म दफ़नाया रहा
वो क़ातिल भी था मसीहा भी था ख़ुदा भी था
जब गले लगाया तो दिल कितना दुखाया रहा
साथ चला तो एक भीड़ थी कोई कारवाँ न था
हाथ थाम कर भी 'धरम' हर कोई पराया रहा
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