दरिया के बीच में किनारा उभर आया है
थोड़ा सा पानी भी बहकर इधर आया है
चेहरा बेरंग था साँसें भी तेज चल रही थी
सीने का ज़ख्म आईने को नज़र आया है
साँसों से निकलकर सीने में दफ़्न था जो
क्यूँ वह चेहरा चौखट पर दीगर आया है
रास्ते ज़िंदगी के यूँ आसाँ तो न थे मगर
जिधर भी निकला राह में शजर आया है
कैसा दिल-ए-बाग़ है वो बाग़बाँ कैसा है
फूल खिलते ही ज़ेहन में शरर आया है
कि रिश्ता मुकम्मल हो भी तो कैसे हो
हाथ थामते ही दामन में ज़रर आया है
बात उसके आने की चली ही थी 'धरम'
सब खोजने लगे की वो किधर आया है
दीगर : पुनः
ज़ेहन : मन
शरर : अग्निकण
ज़रर : तकलीफ़
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