Thursday, 27 April 2023

राह में शजर आया है

दरिया के बीच में किनारा उभर आया है 
थोड़ा सा पानी भी बहकर  इधर आया है 

चेहरा बेरंग था साँसें भी तेज चल रही थी  
सीने का ज़ख्म आईने को नज़र आया है
 
साँसों से निकलकर सीने में दफ़्न था जो 
क्यूँ वह चेहरा चौखट पर दीगर आया है 

रास्ते ज़िंदगी के यूँ  आसाँ तो न थे मगर 
जिधर भी निकला राह में शजर आया है

कैसा दिल-ए-बाग़ है वो बाग़बाँ कैसा है     
फूल खिलते ही  ज़ेहन में शरर आया है 

कि रिश्ता मुकम्मल  हो भी  तो कैसे हो  
हाथ थामते ही  दामन में  ज़रर आया है

बात उसके आने की चली ही थी 'धरम'
सब खोजने लगे की वो किधर आया है
 
 

दीगर : पुनः
ज़ेहन : मन
शरर : अग्निकण
ज़रर : तकलीफ़

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