आँखें सिर्फ़ एक बार मिली फिर नज़र झुकाना पड़ा मुझे
फिर ख़ुद को अपनी रूह में ख़ुद ही में समाना पड़ा मुझे
कैसी इश्क़ की बीमारी थी जाने कहाँ तुझ में खो गया था
ख़ुद अपनी ही महफ़िल में ख़ुद ही को बुलाना पड़ा मुझे
उसको यक़ीं-ए-इश्क़ दिलाना कुछ यूँ आसाँ तो नहीं था
दिल दिमाग़ तसव्वुर ख़्वाब सब कुछ दिखाना पड़ा मुझे
कभी रास्ते का भरम रहा कभी रहबर की मक्कारी रही
ऐ! मंज़िल-ए-मक़्सूद तुझे हर सफ़र में भुलाना पड़ा मुझे
आँखों में कभी ख़ून न उतरा बदन में कभी आग न लगी
ता-उम्र कुछ इस तरह से उसका क़र्ज़ चुकाना पड़ा मुझे
जब भी ख़ुद से गुफ़्तगू हुई तो वक़्त ने कभी दस्तक न दी
फिर बिना नींद के ही "धरम" ख़ुद को सुलाना पड़ा मुझे
मक़्सूद : ख्वाहिश
मक्कारी : फ़रेब
दस्तक : खटखटाना
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